हड़प्पाई अर्थव्यवस्था के वे कौन-कौन से पहलू है, जिनका पुनर्निर्माण पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर किया गया है ?

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हड़प्पा अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के पुरातात्विक साक्ष्य

1. कृषि के पुरातत्व साक्ष्य– हड़प्पा सभ्यता कृषि प्रधान सभ्यता थी। विद्वानों का मत है कि कपास का पौधा सिन्धु प्रदेश का प्राकृतिक पौधा था अर्थात् सिन्धु का क्षेत्र उसका मूल जन्म स्थान था। खुदाई में गेहूँ, जौ, मटर, राई, ज्वार, चावल, तिल, तरबूज, खजूर, नींबू, अनार तथा नारियल के मिले हैं। इससे स्पष्ट है कि सिन्धुवासी इनकी खेती करते थे।

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2. पशुपालन के साक्ष्य– खुदाई में विभिन्न प्रकार के पशुओं की हड्डियाँ मिली हैं, जिनमें बिल्ली, कुत्ता, कुब्बड़दार बैल, बकरी, भेड़, भैंस तथा सुअर प्रमुख थे। खुदाई में मिट्टी की लघु मूर्तियाँ तथा मुहरों पर अंकित चित्रों से हमें उन अन्य अनेक पशुओं का अनुमान होता है जिनसे सिन्धुवासी परिचित थे। इनमें कुब्बड़दार बैल, बन्दर, हाथी, खरगोश, बतख तथा तोता मुख्य थे। अनेक जंगली पशुओं के भी साक्ष्य मिले हैं। यहाँ पर ऊँट तथा घोड़ों की हड्डियाँ नहीं मिली हैं और न चित्र।

3, शिल्प उत्पादन तथा धातुओं के प्रयोग के साक्ष्यमोहनजोदड़ों तथा हड़प्पा की खुदाई में अनेक वस्तुएँ मिली हैं जिनमें आभूषण, चाँदी तथा सोने की वस्तुएँ, ताँबे के अनेक औजार, हथियार, बर्तन आदि मिले हैं। इसके अलावा रांगा और सीसा के भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इनके प्रयोग से का चरम विकास हुआ। चन्हुदड़ो से शिल्प उत्पादन से सम्बन्धित पूरी बस्ती ही मिली है। शिल्प कार्यों में मनके बनाना, शंख की कटाई, मुहर निर्माण, बाँट बनाना आदि
प्रमुख था। पुरातत्वविदों द्वारा किए गए प्रयोगों ने यह दर्शाया है-

कि कार्जीलियन का लाल रंग, पीले रंग के कच्चे माल तथा उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पका कर प्राप्त किया जाता था। खुदाई से पता चला है कि नागेश्वर तथा बालाकोट चूड़ियाँ, करधनियाँ, पच्चीकारी आदि का केन्द्र थे। उत्पादन केन्द्रों की पहचान के लिए पुरातत्वविद सामान्यतः निम्नलिखित को ढूँढते हैं-प्रस्तरपिण्ड, पूरे शंख, ताँबा, अयस्क जैसा कच्चा माल, औजार सम्पूर्ण वस्तुएँ, छोड़ा गया माल, कूड़ा-करकट आदि। इन वस्तुओं से निर्मित वस्तुओं से यहाँ की अर्थव्यवस्था के निर्माण में बहुत सहयोग मिला।

4. वस्त्र निर्माण के साक्ष्य– खुदाई में सूत कातने के चरखे तथा तकलियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं जिससे पता चलता है कि सिन्धु नगरों में घर-घर में कताई-बुनाई का काम होता था। गर्म कपड़े के लिए सिन्धुवासी ऊन का प्रयोग करते थे। कुछ बर्तनों पर चिपका हुआ कपड़ा मिला है जो लाल रेशे से बना मालूम होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सूती कपड़े को रंगने की प्रथा थी।

5. आभूषण– बड़े उच्चकोटि के आभूषण एक कलसी में रखे मिले हैं जिनकी सुन्दरता देखने योग्य है। इनमें सिरबन्द, लटकन, कर्णफूल, बटन, क्लिप, माथे की बिन्दियाँ, कनपटी के भूषण, चूड़ियाँ, भुजबन्द, करधनी, नाक-कान की बालियाँ, कड़े तथा पायजेबें प्रमुख थे। हारों में सोना, चाँदी, ताँबा, पत्थर, मरकता, दूधिया लाजवर्द आदि पत्थरों के रंग-बिरंगे दर्शनीय मनके खराद पर चढ़ाकर बनाये जाते थे।

6.बर्तन निर्माण के साक्ष्य-खुदाई में अनेक प्रकार के बर्तन तथा भांडे मिले हैं। ये बर्तन ताँबा, कांसा, पीतल तथा मिट्टी के बनाए जाते थे। हड़प्पा में ताँबे के देगचे, कलसियाँ, थालियाँ, गोल, घटमंच चिमटा कटोरा आदि मिले हैं किन्तु बर्तनों का निर्माण अधिकतर मिट्टी से किया जाता था। धातुओं के दुर्लभ होने के कारण धनी तथा निर्धन प्राय: सभी मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। उस समय तक चाक का आविष्कार हो चुका था और बर्तन उसी की सहायता से बनाए जाते थे।

खुदाई में बड़ी मात्रा में हथियार, औजार, बाँट माप मिले हैं और इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि सिन्धुवासियाँ का विदेशों से भी व्यापारिक सम्बन्ध था। उपर्युक्त साक्ष्यों के आधार पर पुरात्ववेत्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि हड़प्पा का आर्थिक संगठन सुदृढ़ था और लोग सुखी और सम्पन्न थे।

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