शीत युद्ध के दौरान भारत की अमरीका और सोवियत संघ के प्रति विदेश नीति क्या थी ?

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शीत युद्ध के दौरान भारत की अमरीका और सोवियत संघ के प्रति विदेश नीति क्या थी ? क्या आप मानते हैं कि इस नीति ने भारत के हितों को आगे बढ़ाया? भारत ने शीत युद्ध के दौरान स्वयं को दोनों गुटों से दूर रखते हुए नव स्वतन्त्रता प्राप्त देशों का किसी भी गुट में सम्मिलित होने का विरोध किया।

शीत युद्ध के दौरान भारत की अमरीका और सोवियत संघ के प्रति विदेश नीति क्या थी ?

अपनी इस नीति के क्रियान्वयन के लिए भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया। भारत ने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता के रूप में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका तथा सोवियत संघ के प्रति अपनी विदेश नीति के अन्तर्गत निम्न भूमिका का प्रभावी निर्वहन किया।

(1) हालांकि गुट-निरपेक्ष नीति के अन्तर्गत भारत ने स्वयं को दोनों ही महाशक्तियों की गुटबन्दी से दूर रखा, लेकिन शीत कालीन प्रतिद्वन्द्विता की जकड़ कमजोर करने हेतु अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रूप से प्रभावी हस्तक्षेप करने में किसी की कमी नहीं की।

(2) भारत ने अमेरिका तथा सोवियत संघ गुटों के बीच विद्यमान मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया।

3) भारतीय राजनायिकों तथा नेतृत्वकर्ताओं का उपयोग प्रायः के दौर के प्रतिद्वन्द्वियों के बीच संवाद स्थापित करने एवं मध्यस्थता करने के लिए भी हुआ।

4) शीतयुद्ध के दौरान भारत ने उन क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय को भी सक्रिय किया जो अमेरिका एवं सोवियत संघ के गुट से जुड़े नहीं थे। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू स्वतंत्र एवं परस्पर सहयोगी देशों के एक सच्चे ‘राष्ट्र कुल’ अटूट विश्वास रखा जिससे वह शीतयुद्ध को समाप्त करने के प्रयास में एक सकारात्मक भूमिका का निर्वहन कर सके। हम यह मानते हैं कि भारत द्वारा बनाई गई गुट-निरपेक्ष नीति ने भारतीय हितों को आगे बढ़ाया। अतः भारत सदैव ऐसी स्थिति में रहा कि यदि कोई एक महाशक्ति हमारे हितों का विरोध करे तो दूसरी महाशक्ति देश को सहयोग करने हेतु तत्पर रहे। उक्त तथ्यों स्पष्ट है कि शीतयुद्ध के दौरान भारत १अपने हितों के लिए निरन्तर सजग रहा।

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