मौर्यकाल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।

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मौर्यकाल में कुषाण, शक क्षत्रप तता गुप्त काल आता है। उनके राजत्व सम्बन्धित विचार निम्न प्रकार हैं

उत्तर मौर्यकाल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।

1. शक क्षत्रप के राजत्व सम्बन्धी सिद्धान्त- शकों का साम्राज्य अनेक प्रान्तों में विभाजित था। इन प्रान्तों पर शक्तिशाली शक सामन्त शासत करते थे, जो क्षत्रप कहलाते थे जिस प्रकार शकों में दो राजा साथ-साथ राज्य करते थे, वैसे ही दो क्षत्रप या महाक्षत्रप तथा एक क्षत्री साथ-साथ शासन किया करते थे।

इनमें से एक वरिष्ठ होता था और दूसरा कनिष्ठ, कनिष्ठ क्षत्रप सामान्यतः वरिष्ठ क्षत्रप का पुत्र होता था और अपने पिता की मृत्यु के बाद वरिष्ठता प्राप्त कर लेता था। इनमें कई शक्तिशाली क्षत्रप हुए जिन्होंने राजा के समान ही शासन किया। उनका भी राजत्व का सिद्धान्त धर्म से प्रभावित था।

उन्होंने भी अपने आप को देवतुल्य बनाने का प्रयास किया और निरंकुशतापूर्वक शासन किया। शक विदेशी थे किन्तु उनका भारतीयकरण हो गया था। शक सम्राट को ईश्वर या देवता माना जाता था। वह चक्रवर्तिन राजाधिराज, देव पुत्र आदि उपाधियाँ धारण करता था। शक शासक हिन्दू धर्म के संरक्षक के रूप में काम करते थे। सम्राट को सलाह देने के लिए मंत्री भी होते थे। शक सम्राट धार्मिक रूप से सहिष्णु थे और साहित्य प्रेमी थे।

कुषाणों के राजत्व सम्बन्धी सिद्धान्त- कुषाणों का राजा निरंकुश होता था। राजा को देवतुल्य समझा जाता था। कई कुषाण शासकों ने अपने नाम के सामने ‘देवपुत्र’ की उपाधि भी लगाई थी। चीन के शासक अपने आप को ‘स्वर्ग पुत्र’ मानते थे। इसी से प्रेरणा लेकर उन्होंने ‘देवपुत्र’ कहा। कुषाण शासकों में कनिष्क सबसे प्रसिद्ध था। निरकुंश होते हुए भी उसने जनता के हित का सदैव ध्यान रखा और उसके कल्याण के लिए काम किया।

कुषाण काल के जो सिक्के उपलब्ध हुए हैं उनमें एक राजा की भव्य प्रतिमा दिखाई गई है। सिक्के के दूसरी ओर एक देवता का चित्र है। इससे सिद्ध होता है कि उस सम्राट को देवतुल्य माना जाता था। उसका शासन दैवी सिद्धान्त के आधार पर चलता था।

गुप्त शासकों के राजत्व सम्बन्धी सिद्धान्त- गुप्तकालीन राजत्व सम्बन्धी सिद्धान्तों का विवरण निम्न प्रकार है

(i) राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली-

गुप्तों की शासन प्रणाली का स्वरूप राजतन्त्रात्मक था। शासन की सर्वोपरि सत्ता का उपभोग सम्राट करता था। प्रयाग प्रशस्ति के लेख में समुद्रगुप्त को एक ऐसा सम्राट बताया गया है जो देवता रूप में पृथ्वी पर निवास करता था। इससे स्पष्ट है कि शक तथा हिन्दू विचारकों द्वारा प्रतिपादित राजाओं का दैवी सिद्धान्त इस युग

में लोकप्रिय हो चला था, किन्तु इस युग के भारतीय शासक 16वीं शताब्दी के यूरोपीय राजाओं की भाँति स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं समझते थे और न इस बात का दावा करते. थे कि वे जो कुछ करते हैं, वह गलत हो ही नहीं सकता। सामान्यतः राजा का सबसे बड़ा पुत्र उसका उत्तराधिकारी होता था और राजा अपने जीवन काल में ही उसे युवराज घोषित कर देता था।

कभी-कभी योग्यता तथा चरित्र बल को ध्यान में रखते हुए शासक लोग अपने छोटे पुत्रों को भी उत्तराधिकारी घोषित कर दिया करते थे। सामान्यतः छोटे पुत्रों को प्रान्तीय शासकों के पद पर नियुक्त कर दिया जाता था। राज्य की राजनीतिक सैनिक, प्रशासनिक तथा न्याय सम्बन्धी सभी शक्तियाँ राजा के हाथ में केन्द्रित हुआ करती थीं। यद्यपि वह मन्त्रियों की सहायता से कार्य करता था किन्तु अन्तिम उत्तरादियत्व राजा का रहता था।

(ii) सामन्ती व्यवस्था-

गुप्त शासन प्रणाली में सामन्ती व्यवस्था थी। सामन्तवादी सिद्धांत को अपनाने का कारण यह था कि गुप्त साम्राज्य अति विशाल था तथा सत्ता के विकेन्द्रीकरण के बिना शासन संचालन बड़ा ही दुष्कर कार्य था। गुप्त सम्राटों ने समस्त विजित देशो पर सीधा शासन करने का प्रयत्न नहीं किया था। अनेक राजाओं को उन्होंने करद बनाकर छोड़ दिया था। इन सब राजाओं की स्थिति एक सी नहीं थी।

किसी पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण अधिक होता था और किसी पर कम। आन्तरिक मामलों में वे स्वतन्त्र होते थे, किन्तु वे सम्राट की अधीनता स्वीकार करते कर देते और विशेष अवसरों पर स्वयं जाकर सम्राट का अभिवादन करते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि गुप्त सम्राटों ने अपने सामन्तों को निजी सिक्के चलाने की आज्ञा नहीं दी थी।

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