अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं ?

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अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं ?– मौर्यकालीन शासन व्यवस्था के प्रमुख अभिलक्षणों का वर्णन निम्नलिखित है –

Read – यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डॉ. डी. सी. सरकार का वक्तव्य है-“भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिनका प्रतिबिम्ब अभिलेखों में नहीं है।”

अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं ?

केन्द्रीय शासन 1. सम्राट- सिद्धान्ततः मौर्य सम्राट निरंकुश था। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायिक तथा सेना सम्बन्धी सभी विषयों में अन्तिम सत्ता सम्राट के हाथ में थी, किन्तु वह स्वेच्छाचारी नहीं था. “सम्राट प्रजा को अपने पुत्रों की भाँति समझता था।

वह अपनी शक्ति को ईश्वर प्रदत्त नहीं मानता था और न वह स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि ही समझता था। देश की धार्मिक तथा सामाजिक परम्पराओं का उसे आदर करना पड़ता था। मौर्य-शासन को हम ‘उदार निरंकुश शासन’ कह सकते हैं समाट स्वयं यद्ध तथा न्याय के कार्यों में भाग लेता था।


विभागीय व्यवस्था- कौटिल्य ने भारी संख्या में अध्यक्षों का उल्लेख किया है जो विभिन्न सरकारी विभागों के अधीक्षक होते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि कौटिल्य के अधीक्षक और स्ट्रेबो द्वारा वर्णित न्यायाधीश एक ही थे। इस काल में नौकरशाही पूर्ण अनुशासित, ईमानदार तथा सुव्यवस्थित थी। सम्राट का इस पर पूर्ण नियन्त्रण था। शासन की सुविधा के लिए 18 विभागों की स्थापना की थी, जिनको तीर्थ कहा जाता था। एक विभाग में अनेक उप-विभाग थे। प्रमुख विभाग थे

1. प्रधानमंत्री- इस पद पर चाणक्य नियुक्त था।

2. समाहर्ता- कर चुंगी को इकट्ठा करने वाला अधिकारी।

3. सन्निधाती- सरकारी कोष, सिक्कों तथा राजकुटुम्ब का प्रबन्धका सेनापति- युद्ध विभाग का प्रधान।

5. युवराज- राजपुत्र जो भावी सम्राट हो तथा उसे अनुभव के लिये किसी भी विभाग का प्रधान बना दिया जाता।

6. व्यावहारिक- दीवानी न्यायालय का प्रमुख।

7. प्रदेष्ठा- फौजदारी न्यायालय का अधिकारी था।

8. कार्यान्तिक- राजकीय उद्योगों का संचालन।

9. नायक- सैनिक छावनियों की व्यवस्था।

10. दण्डपाल- पुलिस अधिकारी।

11. मंत्रिपरिषद् का अध्यक्ष- परिषद् की बैठक आदि की व्यवस्था करना।

12. पौर- नगर व्यवस्था का प्रधान अधिकारी। आन्तवेशिक- अंगरक्षक सेवा का प्रधान।

14. वन विभाग का अधिकारी।

प्रशास्ता- रिकॉर्ड रखने वाला अधिकारी। । प्रान्तीय शासन- इतने बड़े साम्राज्य का प्रबन्ध सुचारु रूप से एक केन्द्र से नहीं चल सकता था, इसलिए साम्राज्य को प्रान्तों में बाँट दिया गया था।

चन्द्रगुप्त के समय में सम्भवतः पाँच या छ: मुख्य प्राप्त रहे होंगे-

(1) मगध तथा आस-पास का प्रदेश, जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।

(2) उत्तरापथ जिसकी राजधानी तक्षशिला थी।

(3) सेल्यूकस से जीते हुए प्रदेशों का एक प्रान्त, जिसकी राजधानी सम्भवतः कपिशा थी

(4) सौराष्ट्र जिसकी राजधानी गिरिनार थी।

(5) अवन्ति (राजधानी उज्जयिनी) तथा

(6) दक्षिणापथ (राजधानी सुवर्णगिरि)। |

मगध के प्रान्त पर सम्राट स्वयं शासन करता था। दूर के प्रान्तों के शासक ‘कुमार’ कहलाते थे तथा राजवंश के होते थे। मे प्रान्तीय शासकों पर केन्द्रीय सरकार का कठिन नियन्त्रण रहता | स था। कुमारों के साथ ‘महामात्य’ नामक अधिकारी सम्बन्धित | दे थे, जो सीधे सम्राट से आज्ञा लेते थे। उनके कामों की जाँच |


,के लिए राजधानी से समय-समय पर विशेष पदाधिकारी भेजे जाते थे। इसके अतिरिक्त सम्राट गुप्तचरों की एक विशाल सेना रखता था, जो उसे राज्य के विभिन्न भागों का समाचार लाकर देते थे। प्रत्येक प्रान्त मण्डलों में विभक्त था जिनमें महामात्य शासन करते थे। मण्डल जनपद और जनपद नगरों में विभक्त था। प्रत्येक जनपद की छोटी इकाई ग्राम थी। 10 ग्रामों के समूह

प्रान्तों के अतिरिक्त साम्राज्य में ऐसे भी अनेक प्रदेश थे, जिन्हें स्वायत्त शासन प्राप्त था। आन्तरिक शासन में वे स्वतन्त्र थे। सम्राट को वे निश्चित कर देते तथा वैदेशिक मामलों में उसकी अधीनता मानते थे।

को संग्रहण, 200 ग्रामों के समूह को खाटिक, 400 ग्रामों के समूह को द्रोणमुख व 800 ग्राम के समूह को स्थानीय कहते थे।

नगरों का प्रबन्ध- मेगस्थनीज ने केवल पाटलिपुत्र के नगरप्रशासन का विवरण दिया है, किन्तु इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि साम्राज्य के अन्य बड़े-बड़े नगरों में भी इसी प्रकार का प्रबन्ध रहा होगा। पाटलिपुत्र के लिए 30 अध्यक्षों का एक आयोग था आयोग को पाँच-पाँच सदस्यों की छ: समितियों में बाँटा गया था। हर समिति के सुपुर्द अलगअलग काम थे।

पहली समिति का काम व्यापार तथा उद्योगधन्धों की देखभाल करना था वह शिल्पियों का वेतन निश्चित करती तथा हर प्रकार से उनके हितों की रक्षा करती थी। दूसरी समिति विदेशियों की देखभाल करती, बाहर से आने वालों की सावधानी से जाँच करती, उनके पासपोर्ट देखती और उन पर मुहर लगाती, उनको उचित स्थान पर ठहराती तथा उनकी सुविधा का प्रबन्ध करती थी। बीमार होने फर उनकी चिकित्सा का प्रबन्ध करती और मर जाने पर उनका सामान उनके सम्बन्धियों के पास भिजवा देती थी। इससे अनुमान लगाया जाता है कि पाटलिपुत्र में विदेशी लोग बड़ी संख्या में आतेजाते होंगे।

तीसरी समिति का कार्य जन्म-मरण का लेखाजोखा रखना था। राज्य कर वसूल करने के लिए जनगणना करना भी इसी समिति का कार्य था। चौथी समिति तैयार माल के क्रय-विक्रय का प्रबन्ध करती और नाप-तौल का निरीक्षण करती थी। पाँचवी समिति का काम था उत्पादकों के काम पर नियंत्रण रखना, जिससे वे पुराने माल को नये में मिलाकर न बेच सकें। छठवीं समिति राज्य कर वसूल करती थी। कर देने में आनाकानी करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाता था। सम्मिलित रूप से ये समितियाँ नगर की सफाई इत्यादि की

देखभाल करती थीं। मन्दिरों, बंदरगाहों बाजारों तथा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की रक्षा करना भी इन्हीं का काम था।

गाँवों का प्रबन्ध- नगरों की भाँति गाँवों के लोग भी स्वायत्तता का उपभोग करते थे। पहले से चली आई ग्राम सभाएँ अभी तक विद्यमान थीं। अन्तर केवल इतना हो गया कि अब इसका प्रमुख गाँव वालों द्वारा निर्वाचित न होकर सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता था और सरकारी पदाधिकारी समझा जाता था। ग्राम-सभा के सदस्यों का चुनाव होता था। सभा के अधिकार काफी थे। वह साधारण झगड़ों का निपटारा करती और अपराधियों को दण्ड देती थी इसके अतिरिक्त वह मार्गों, पुलों, जलाशयों आदि की देखभाल भी करती थी।

उसकी आय के अनेक साधन थे। जुर्माना आदि से उसे काफी धन मिल जाता था। सरकार से भी उसे आर्थिक सहायता प्राप्त होती रहती थी। राजस्व- राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि-कर था। साधारणतया उपज का छठा भाग राज्य कर के रूप में वसूल किया जाता था, उसे ‘भाग’ कहते थे। विशेष परिस्थितियों में चौथाई अथवा आठवाँ अंश लिया जाता था। राज्य-कर वसूल करने के लिए अलग पदाधिकारी थे जिन्हें अग्रोनोमोई नाम दिया है। भूमि की नाप तथा सिंचाई का काम भी इन्ही अधिकारियों के हाथों में था। त्याय-व्यवस्था- चन्द्रगुप्त की न्याय-व्यवस्था सुसंगठित थी।

सिद्धान्ततः सम्राट न्याय का अन्तिम स्रोत था, किन्तु उसके लिए इतने बड़े साम्राज्य के न्याय प्रशासन का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेना सम्भव नहीं था। अत: वह केवल नीचे के न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनता था। साम्राज्य में दो प्रकार के न्यायालय थे- ‘धर्मष्ठीय’ और ‘कण्टकशोधन’।

(1) धर्मष्ठीय न्यायालयों में धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित परम्परागत विधि के अनुसार न्याय किया जाता था। ‘कण्टकशोधन’ न्यायालय विशेष प्रकार के थे और उसकी स्थापना उस युग की जटिल सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को ध्यान में रखकर की गयी थी। इनका स्वरूप अर्द्ध-न्यायिक

इनकी प्रणाली न्यायालयों जैसी नहीं थी, बल्कि वर्तमान युग के पुलिस विभाग की प्रणाली से मिलती-जुलती थी। सिना का प्रबन्ध- इतने बड़े साम्राज्य की रक्षा के लिए एक विशाल सेना की आवश्यकता थी। इस विशाल सेना के प्रबन्ध के लिए 30 सदस्यों का एक आयोग था, जिसमें छ: समितियाँ थीं। प्रत्येक समिति के जिम्मे एक विभाग का प्रबन्ध था। नौसेना, यातायात तथा सम्भरण, पैदल, अश्वारोही रथ तथा हाथीये छ: विभाग थे।

राज्य से सैनिको को नियमित वेतन मिलता था। गुप्तचर व्यवस्था- राज्य में शान्ति व्यवस्था स्थापित करने के लिये गुप्तचर विभाग की स्थापना की गई। इस काल में गुप्तचरों को चर कहा जाता था। इसमें पुरुष तथा स्त्रियाँ दोनों शामिल होती थीं। यूनानी लेखकों ने उनको ओवरसियर तथा इन्स्पेक्टर कहा है।

लोकोपकारी कार्य- मेगस्थनीज ने उत्तर-पश्चिम से लेकर पाटलिपुत्र तक आने वाली सड़क का वर्णन किया है। इसमें प्रत्येक मील पर विभिन्न दिशाओं में जाने वाले मागों के संकेत चित्र दिये गए थे। इसके दोनों ओर वृक्ष थे। सफाई का विशेष प्रबन्ध था। मौर्य सम्राटो ने नहरों और झीलों का निर्माण करवाया। राज्य की तरफ से अस्पतालों का प्रबन्ध किया गया था। राज्य की जनगणना के लिए एक पृथक् विभाग तथा प्रत्येक स्थान पर जन्म और मृत्यु की गणना की जाती थी।

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